महाकवि कालिदास विरचित मेघदुतम् संस्कृत साहित्य का एक कालजयी और अद्वितीय गीतिकाव्य (खण्डकाव्य) है। इसमें कर्तव्य-प्रमाद के कारण कुबेर द्वारा एक वर्ष के लिए देश-निकाल दिए गए एक विरही यक्ष की मार्मिक व्यथा का चित्रण है। रामगिरि पर्वत पर निवास करते हुए, आषाढ़ के पहले दिन आकाश में उमड़ते मेघों को देखकर यक्ष की विरह-वेदना जाग उठती है। वह अपनी प्रियतमा के पास अलकापुरी संदेश भेजने के लिए अचेतन मेघ को अपना दूत बनाता है। यह काव्य पूर्वमेघ और उत्तरमेघ दो भागों में विभक्त है, जिसमें मंदाक्रान्ता छंद के माध्यम से प्रकृति, प्रेम, और विरह की अनूठी अभिव्यक्ति की गई है।
डॉ. धर्मेन्द्र भट्ट ने संस्कृत विषय में एम.ए., एम.फिल., बी.एड. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। उनके पीएच.डी. शोध का विषय कवि कालिदास के मेघदूत की एक टीका का संपादन है। उन्होंने जोनराज कृत किरातार्जुनीय टीका का समीक्षित पाठसंपादन तथा Catalogue of Manuscripts of Lalbhai Dalpatbhai Institute of Indology Collection (Vol. 7) जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया है। श्रीमती ए.पी. पटेल आर्ट्स कॉलेज, नरोडा (अहमदाबाद) में संस्कृत विषय के प्रवासी व्याख्याता के रूप में उन्हें 10 वर्षों का अध्यापन अनुभव है। वर्ष 2007 से अब तक गुजरात सहित देश के छह राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों में आयोजित लगभग 30 राज्यस्तरीय एवं राष्ट्रीय स्तर की लिपिविषयक कार्यशालाओं में उन्होंने शारदा लिपि तथा ग्रंथ लिपि के विशेषज्ञ के रूप में व्याख्यान दिए हैं। वर्तमान में वे एल. डी. इन्स्टिट्युट ऑफ इण्डोलॉजी के हस्तप्रत विभाग में संशोधन सहायक के रूप में पिछले आठ वर्षों से कार्यरत हैं।
Venue: Lecture Hall, L D Museum
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मेघदूतम्, संग्रह: एल. डी. इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी